
दिग्गज स्टॉक ब्रोकिंग फर्म Zerodha ने अपने Kite ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर एक नया डेटा प्वाइंट जोड़ा है। इसके जरिए निवेशक अब IPO के लॉक-इन एक्सपायरी टाइमलाइन को आसानी से ट्रैक कर सकते हैं। इसका मकसद यह समझने में मदद करना है कि किसी नए लिस्ट हुए शेयर में लिस्टिंग के बाद कीमत पर दबाव कब और क्यों आ सकता है।
IPO में लॉक-इन का मतलब क्या है
Zerodha के फाउंडर और CEO नितिन कामत (Nithin Kamath) ने एक सोशल पोस्ट में बताया कि IPO में शेयरहोल्डिंग का एक बड़ा हिस्सा लिस्टिंग के बाद भी तुरंत बाजार में नहीं आ पाता।
आमतौर पर प्रमोटर्स, शुरुआती निवेशक और कर्मचारी जिनके पास ESOP होते हैं, उनके शेयर कुछ समय के लिए लॉक-इन रहते हैं। यह लॉक-इन पीरियड 30 दिन से लेकर 18 महीने तक का हो सकता है।
लॉक-इन खत्म होते ही प्राइस पर दबाव
कामत के मुताबिक, जैसे ही लॉक-इन पीरियड खत्म होता है, बड़े शेयरहोल्डर्स अपनी होल्डिंग का कुछ हिस्सा बेच सकते हैं। इससे बाजार में शेयरों की सप्लाई अचानक बढ़ जाती है।
ऐसी स्थिति में, भले ही कंपनी के फंडामेंटल्स में कोई बदलाव न हुआ हो, फिर भी शेयर की कीमत पर दबाव आ सकता है। खासकर लॉक-इन खत्म होने के बाद के कुछ हफ्तों में यह असर ज्यादा देखने को मिलता है।
Kite प्लेटफॉर्म पर कहां मिलेगी जानकारी
निवेशकों की इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए Zerodha ने IPO लॉक-इन से जुड़ी जानकारी Kite में जोड़ दी है।
यह डेटा Kite के ‘Fundamentals’ विजेट के अंदर ‘Events’ सेक्शन में दिखाई देता है। यहां निवेशक यह देख सकते हैं कि किसी हाल में लिस्ट हुई कंपनी का अगला लॉक-इन कब खत्म होने वाला है।
Zerodha ने यह जानकारी फाइनेंशियल रिसर्च प्लेटफॉर्म Tijori से ली है। यानी निवेशकों को एक भरोसेमंद सोर्स के आधार पर लॉक-इन एक्सपायरी की डिटेल मिलती है।
निवेशकों के लिए यह जानकारी जरूरी क्यों
मार्केट के जानकार IPO के बाद लॉक-इन एक्सपायरी को एक अहम इवेंट मानते हैं। खासकर उन कंपनियों में, जहां प्रमोटर, वेंचर कैपिटल या प्राइवेट इक्विटी की हिस्सेदारी ज्यादा होती है। वहां इसका असर और भी बड़ा हो सकता है।
एनालिस्ट्स का कहना है कि अगर रिटेल निवेशकों को पहले से यह पता हो कि कब बड़े शेयरहोल्डर्स के शेयर बाजार में आ सकते हैं, तो वे संभावित ज्यादा वोलैटिलिटी के लिए तैयार रह सकते हैं। इससे ट्रेडिंग और निवेश से जुड़े फैसले ज्यादा सोच-समझकर लिए जा सकते हैं।