
लंबी अवधि में बड़ा फंड तैयार करने में मल्टीबैगर से ज्यादा हाथ अनुशासन, रिस्क मैनेजमेंट और निवेश की अवधि का होता है। एक्सिस एएमसी के चीफ इनवेस्टमेंट अफसर आशीष गुप्ता ने यह कहा। मनीकंट्रोल के अहमदाबाद में आयोजित म्यूचुअल फंड समिट में उन्होंने इनवेस्टमेंट और वेल्थ क्रिएशन के बारे में कई अहम बातें बताईं।
गुप्ता ने कहा कि यह सही है कि मल्टीबैगर्स इनवेस्टर्स को काफी अट्रैक्ट करते हैं, लेकिन इनवेस्टमेंट का मतलब लंबे समय तक निवेश बनाए रखना है। आप मार्केट में कब एंट्री करते हैं, इससे ज्यादा अहम यह है कि आप मार्केट में कितना समय बिताते हैं। उन्होंने कहा कि फंड मैनेजर्स का फोकस फंड के बेहतर प्रदर्शन पर होना चाहिए ताकि इनवेस्टर्स लंबे समय तक अपना निवेश बनाए रखे। फंड मैनेजर को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इनवेस्टर्स शॉर्ट टाइमफ्रेम में अपना पैसा निकालने के लिए मजबूर ना हो। रिटर्न जरूरी है लेकिन रिस्क मैनेजमेंट भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने कहा, “पोर्टफोलियो बनाने का मतलब सिर्फ किसी स्टॉक की तलाश करना नहीं है। यह दरअसल अनुशासन बनाए रखना है, जिससे अलग-अलग मार्केट साइकिल में परफॉर्म करने की क्षमता पोर्टफोलियो में आती है। मकसद बेस्ट स्टॉक को बेस्ट प्राइस पर सेलेक्ट करना हो सकता है। लेकिन, उसका सही वेटेज और पोजीशन तय करना भी उतना ही जरूरी है।” उन्होंने कहा कि डायवर्सिफिकेशन जरूरी है, क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता है कि पोर्टफोलियो का प्रदर्शन किसी एक स्टॉक पर निर्भर नहीं होगा।
एक्सिस एएमसी के सीआईओ ने कहा कि किसी स्टॉक से अल्फा (मार्केट से ज्यादा) रिटर्न की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन, गिरावट की स्थिति में उसे पोर्टफोलियो पर ज्यादा दबाव बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। HDFC Bank, Asian Paints और Bajaj Finance जैसे मल्टीबैगर स्टॉक्स का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश में टॉप 250 स्टॉक्स में करीब 40 स्टॉक्स की कीमतें बीते 15 सालों में 10 गुनी हो गई हैं।
उन्होंने कहा कि पोर्टफोलियो को मैनेज करने में कई तरह की अनिश्चितताओं का ध्यान रखना पड़ता है। इनमें कंपनी, मैनेजमेंट और बाहरी बदलाव शामिल हैं। अच्छे मैनजेमेंट वाले स्ट्रॉन्ग बिजनेसेज पर भी टेक्नोलॉजी में बदलाव, रेगुलेटरी शिफ्ट्स या बाहर की घटनाओं का असर पड़ सकता है। जब कोई कंपनी लगातार कई साल तक स्ट्रॉन्ग ग्रोथ दिखाती है और मजबूत फ्रेंचाइजी बनाती है तो वैल्यूएशन का रिस्क पैदा हो सकता है, क्योंकि मार्केट में इसकी कीमत कई गुना हो जाती है।
गुप्ता ने कहा कि आम और पर पोजीशन की शुरुआत 2-4 फीसदी के साथ हो सकती है। अगर कंपनी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहता है तो उसकी हिस्सेदारी बढ़ाकर 7-8 फीसदी की जा सकती है। 10 फीसदी आम तौर पर मैक्सिमम लिमिट मानी जाती है। यहां तक कि 3-4 फीसदी एलोकेशन का भी अच्छा कंट्रिब्यूशन रिटर्न में होता है। ऐसे पोर्टफोलियो जो लंबे समय तक अच्छा परफॉर्म करते हैं, उनमें आम तौर पर कई स्टॉक्स का कंट्रिब्यूशन होता है। शायद ही कभी एक स्टॉक की भूमिका पोर्टफोलियो के बेहतर प्रदर्शन में होती है।