
SEBI के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे (Tuhin Kanta Pandey) ने गुरुवार को कहा कि रेगुलेटर ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (National Stock Exchange) की ओर से दाखिल सेटलमेंट प्ली को इन-प्रिंसिपल मंजूरी दे दी है। यह मामला अनफेयर मार्केट एक्सेस यानी को-लोकेशन केस से जुड़ा है। इस कदम को NSE के IPO के रास्ते में आई सबसे बड़ी बाधा हटने के तौर पर देखा जा रहा है।
IPO के लिए क्यों अहम है यह फैसला
NSE साल 2016 से IPO लाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन को-लोकेशन केस के चलते इसकी योजना अटकी हुई थी। इस मामले में आरोप था कि कुछ चुनिंदा ब्रोकर्स को एक्सचेंज के सिस्टम तक प्राथमिक पहुंच दी गई।
लंबे कानूनी विवाद के बाद NSE ने 2025 में ₹1,388 करोड़ का भुगतान कर सेटलमेंट का प्रस्ताव रखा था, ताकि IPO की प्रक्रिया आगे बढ़ सके। अब SEBI की इन-प्रिंसिपल सहमति को IPO के लिए जरूरी NOC की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
बड़े IPO के लिए सरकार की राहत
SEBI चेयरमैन ने यह भी बताया कि सरकार ने एक अहम प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके तहत बड़ी कंपनियां IPO में अब 2.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेच सकेंगी। पहले यह न्यूनतम सीमा 5 प्रतिशत थी। यह बदलाव उन कंपनियों के लिए मददगार माना जा रहा है, जिनकी वैल्यूएशन ₹5 लाख करोड़ से ज्यादा है। इससे NSE जैसी बड़ी संस्थाओं के लिए IPO लाना आसान हो सकता है।
अनलिस्टेड मार्केट पर टिप्पणी से परहेज
तुहिन कांता पांडे ने अनलिस्टेड मार्केट में NSE के शेयरों को लेकर बढ़ती दिलचस्पी पर टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि यह मामला कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के दायरे में आता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सेटलमेंट आवेदन अभी SEBI की अलग-अलग समितियों में प्रक्रिया में है, लेकिन सिद्धांत रूप में रेगुलेटर इसकी सहमति जता चुका है।
NSE मैनेजमेंट की प्रतिक्रिया
NSE के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO आशीष कुमार चौहान ने कहा कि सेटलमेंट प्ली पर इन-प्रिंसिपल मंजूरी ‘अच्छी खबर’ है। हालांकि, अभी तक उन्हें इस पर कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। उन्होंने बताया कि जैसे ही SEBI से NOC मिलेगी, कंपनी DRHP (ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस) दाखिल करने की तैयारी शुरू कर देगी।
IPO की संभावित टाइमलाइन
चौहान के मुताबिक, SEBI से NOC मिलने के बाद DRHP दाखिल करने में करीब चार महीने लग सकते हैं। इसके बाद रेगुलेटर की मंजूरी के साथ IPO को बाजार में आने में कुल 7 से 8 महीने का वक्त लग सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर संभव हुआ तो इस प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश की जाएगी।
SEBI की निवेश बैंकरों को सख्त नसीहत
SEBI चेयरमैन ने निवेश बैंकरों को चेताया कि रेगुलेटर को अब भी डिस्क्लोजर से जुड़ी ‘बार-बार दोहराई जा रही खामियां’ दिख रही हैं। इससे पारदर्शिता और निवेशकों की समझ प्रभावित होती है।
उन्होंने कहा कि कई मामलों में ड्यू डिलिजेंस पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होती और इश्यूअर के बयानों पर निर्भर रहती है। SEBI कुछ स्पष्ट चीजें चाहता है।
- वर्किंग कैपिटल और कैपेक्स के अनुमान स्वतंत्र रूप से जांचे जाएं।
- कैपिटल स्ट्रक्चर में पिछली फंडिंग, प्रेफरेंशियल अलॉटमेंट और कंट्रोल में बदलाव साफ तौर पर बताए जाएं।
- बिजनेस मॉडल में रेवेन्यू और लागत के ड्राइवर्स स्पष्ट हों।
- मैनेजमेंट डिस्कशन एंड एनालिसिस (MD&A) सिर्फ वर्णन तक सीमित न रहे, बल्कि परफॉर्मेंस के आंतरिक और बाहरी कारणों को भी समझाए।
SEBI के मुताबिक, इन कमियों के चलते रेगुलेटरी सवाल बढ़ते हैं और कंपनियों की फंडरेजिंग टाइमलाइन लंबी हो जाती है।
कुल मिलाकर, NSE के सेटलमेंट पर SEBI की इन-प्रिंसिपल सहमति और IPO में न्यूनतम पब्लिक ऑफर साइज को घटाने की सरकारी मंजूरी- दोनों मिलकर देश के सबसे बड़े एक्सचेंज के IPO को नई रफ्तार दे सकते हैं। अब बाजार की नजर SEBI की औपचारिक NOC और उसके बाद IPO की टाइमलाइन पर टिकी है।
(एजेंसी से इनपुट के साथ)