
F&O Alert: फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) ट्रेडिंग करने वाले निवेशकों और ट्रेडर्स के लिए एक जरूरी अपडेट है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के कई इंडेक्सों के लॉट साइज में कल 31 दिसंबर से बदलाव लागू होने जा रहा है। मौजूदा लॉट साइज के साथ इन इंडेक्सों की आज 30 दिसंबर को आखिरी मंथली एक्सपायरी है।
NSE ने अक्टूबर महीने में ही एक सर्कुलर जारी कर बताया था कि दिसंबर 2025 की एक्सपायरी के बाद उसके चार इंडेक्सों के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के लॉट साइज में बदला किया जाएगा। यह बदलाव मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) के निर्देशों के तहत हो रहा है, जिसमें उसने कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू को 10 से 15 लाख के बीच बनाए रखने का निर्देश दिया था।
किन इंडेक्स के लॉट साइज बदलेंगे?
NSE के मुताबिक, निफ्टी 50, बैंक निफ्टी, निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज और निफ्टी मिडकैप सेलेक्ट के लॉट साइज घटाए जा रहे हैं।
– निफ्टी 50 इंडेक्स का लॉट साइज 75 से घटाकर 65 किया जाएगा।
– बैंक निफ्टी का लॉट साइज 35 से घटाकर 30 किया जाएगा।
– निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज इंडेक्स का लॉट 65 से घटाकर 60 किया जाएगा।
– निफ्टी मिडकैप सेलेक्ट का लॉट साइज 140 से घटाकर 120 किया जाएगा।
हालांकि NSE ने साफ किया है कि निफ्टी नेक्स्ट-50 के लॉट साइज में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
कब से लागू होंगे नए लॉट साइज?
एक्सचेंज ने साफ किया है कि मौजूदा लॉट साइज 30 दिसंबर 2025 की मंथली एक्सपायरी तक सभी वीकली और मंथली कॉन्ट्रैक्ट्स पर लागू रहेंगे। इसके बाद जनवरी 2026 से शुरू होने वाले नए साइकिल में नए लॉट साइज के नियम लागू हो जाएंगे।
वीकली कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए, पुराने लॉट साइज के साथ आखिरी एक्सपायरी 23 दिसंबर 2025 को होगी, जबकि 6 जनवरी 2026 को होने वाली एक्सपायरी से नए लॉट साइज लागू होंगे।
इसी तरह, मंथली कॉन्ट्रैक्ट्स में 30 दिसंबर 2025 की एक्सपायरी के बाद, 27 जनवरी 2026 की एक्सपायरी नए लॉट साइज के साथ होगी।
NSE ने यह भी बताया कि तीन और छह महीने वाले कॉन्ट्रैक्ट्स भी 30 दिसंबर 2025 के कारोबार खत्म होने के बाद नए लॉट साइज में शिफ्ट हो जाएंगे। मार्च 2026 वाला कॉन्ट्रैक्ट, जो पहले तिमाही था, अब दिसंबर 2025 की मंथली एक्सपायरी के बाद ‘चार महीने का’ कॉन्ट्रैक्ट माना जाएगा।
ट्रेडर्स और निवेशकों पर क्या असर पड़ेगा?
लॉट साइज घटने का सीधा मतलब है कि ट्रेडर्स को अपनी पोजीशन साइज और मार्जिन कैलकुलेशन में बदलाव करना होगा। चूंकि डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स में एक्सपोजर लॉट साइज पर निर्भर करता है, इसलिए नया स्ट्रक्चर लागू होने के बाद मार्जिन की जरूरत भी बदल सकती है। वहीं, रिटेल निवेशकों के लिए यह बदलाव पॉजिटिव माना जा रहा है। छोटे लॉट साइज के कारण अब कम पूंजी में भी इंडेक्स डेरिवेटिव्स में भागीदारी संभव होगी, जिससे बाजार में भागीदारी और लिक्विडिटी दोनों बढ़ सकती हैं।
NSE लॉट साइज क्यों बदलता है?
NSE समय-समय पर F&O कॉन्ट्रैक्ट्स के लॉट साइज में बदलाव करता है ताकि कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू एक तय दायरे में बनी रहे। चूंकि डेरिवेटिव्स लीवरेज्ड इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं और ट्रेडर्स को पूरी वैल्यू नहीं बल्कि मार्जिन देना होता है, इसलिए लॉट साइज एक्सपोजर और रिस्क मैनेजमेंट में अहम भूमिका निभाता है। एक्सचेंज का मानना है कि इस तरह के बदलाव से मार्केट की एफिशियंसी, लिक्विडिटी और निवेशकों की भागीदारी बढ़ सकती है।
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