FII selling India: विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय शेयर बाजार में अब भी भारी तौर पर नेट शॉर्ट बने हुए हैं। इसका मतलब कि विदेशी निवेशक अभी मानकर चल रहे हैं कि बाजार आगे दबाव में रह सकता है। इसलिए वे खरीदने से ज्यादा बेचने या गिरावट से फायदा कमाने वाली पोजिशन बनाए हुए हैं।
Trust Mutual Fund के CIO मिहिर वोरा के मुताबिक, इसकी बड़ी वजह यह है कि 2025 में भारत अपने एशियाई साथियों के मुकाबले पीछे रह गया। खासकर उस दौर में जब ग्लोबल लेवल पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) निवेश का बड़ा साइकल चल रहा था।
उनका कहना है कि भारत में न तो AI जैसा कोई बड़ा सेक्टोरल ट्रिगर दिखा और न ही रुपये की कमजोरी ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया। हालांकि, भारत-अमेरिका ट्रेड डील जैसे किसी बड़े डेवलपमेंट से सेंटिमेंट में सुधार आ सकता है।

2025 में भारत क्यों पिछड़ गया
मिहिर वोरा के मुताबिक, अगर 2025 को पीछे मुड़कर देखें तो साफ दिखता है कि भारत न सिर्फ उभरते बाजारों बल्कि कई एशियाई अर्थव्यवस्थाओं से भी अंडरपरफॉर्म करता रहा।
दूसरी तरफ, कोरिया, ताइवान, जापान और चीन जैसे देशों को AI हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर थीम का सीधा फायदा मिला। इन बाजारों ने अमेरिका के बराबर या उससे बेहतर प्रदर्शन किया। वहीं, भारत के पास ऐसा कोई मजबूत AI-बेस्ड ग्रोथ स्टोरी नहीं थी।
उनका मानना है कि जब AI का ग्लोबल हाइप थोड़ा ठंडा पड़ेगा, तब भारत की सामान्य 6-7 प्रतिशत की ग्रोथ रफ्तार बाजार को संभाल सकती है। लेकिन फिलहाल FII के लिए कोई साफ-साफ आकर्षक वजह नजर नहीं आ रही।
करेंसी और सेक्टोरल ट्रिगर की कमी
मिहिर वोरा का कहना है कि रुपये की कमजोरी भी FII के भरोसे पर असर डाल रही है। इसके साथ ही, बाजार में ऐसा कोई बड़ा सेक्टर नहीं दिख रहा जो नई ग्रोथ लीड कर सके।
उन्होंने कहा कि ट्रेड डील एक बड़ा पॉजिटिव ट्रिगर हो सकता है, जो विदेशी निवेशकों की सोच बदलने में अहम भूमिका निभा सकता है।

क्या IT सेक्टर का बुरा दौर खत्म हो चुका है?
IT सेक्टर को लेकर मिहिर वोरा की राय साफ है कि इसे एक साथ नहीं देखा जाना चाहिए। उनका फोकस बड़े IT शेयरों की बजाय मिडकैप और हाई-ग्रोथ IT सर्विस कंपनियों पर है।
उनका कहना है कि लार्जकैप IT कंपनियां अब भी सिंगल डिजिट ग्रोथ में फंसी हुई हैं। अगर बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव नहीं होता, तो सिर्फ AI के नाम पर उनमें तेज ग्रोथ की उम्मीद करना मुश्किल है। तीन से पांच साल के नजरिये से वह लार्जकैप IT में अंडरवेट हैं। वहीं, मिडकैप और स्मॉलकैप में स्टॉक के हिसाब से नजरिया रखते हैं।
ग्रोथ की भूख और वैल्यूएशन का सवाल
मिहिर वोरा के मुताबिक, बाजार हमेशा उस कंपनी को प्रीमियम देता है जिसमें ग्रोथ की भूख साफ नजर आती है। जिन कंपनियों के मैनेजमेंट ने 8 से 24 तिमाहियों तक लगातार ग्रोथ दिखाई है, उन्हें ऊंचा वैल्यूएशन मिलता है।
हालांकि, वह सिर्फ बड़े अधिग्रहण (acquisitions) के आधार पर किसी कंपनी को प्रीमियम देने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि ऑर्गेनिक ग्रोथ जरूरी है, और अधिग्रहण तभी सही है जब वह लंबी अवधि की रणनीति को सपोर्ट करे।

मेटल्स में तेजी, लेकिन नजरिया टैक्टिकल
मेटल सेक्टर में आई हालिया तेजी को लेकर मिहिर वोरा कहते हैं कि उनका निवेश मंत्र आमतौर पर कमोडिटीज के पक्ष में नहीं है, क्योंकि ये लॉन्ग टर्म कंपाउंडिंग के लिए आदर्श नहीं मानी जातीं।
फिर भी, मौजूदा तेजी के पीछे मजबूत कारण हैं। खासतौर पर एल्युमिनियम और कॉपर को वह AI, EV और रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़ी डिमांड का डेरिवेटिव मानते हैं। AI के चलते डेटा सेंटर्स, पावर जेनरेशन और डिस्ट्रीब्यूशन की जरूरत बढ़ रही है, जिससे कॉपर और एल्युमिनियम की मांग को सपोर्ट मिल रहा है।
किन मेटल्स पर ज्यादा फोकस
मिहिर वोरा मुताबिक, उनका झुकाव स्टील की बजाय जिंक, कॉपर और एल्युमिनियम जैसे नॉन-फेरस मेटल्स की ओर ज्यादा है। स्टील को वह स्ट्रक्चरल ग्रोथ स्टोरी नहीं मानते।
इसके अलावा, वह मेटल थीम को अप्रत्यक्ष रूप से एक्सचेंज कंपनियों और गोल्ड फाइनेंसिंग कंपनियों के जरिए भी खेल रहे हैं। कुल मिलाकर, उनके पोर्टफोलियो में सबसे ज्यादा ओवरवेट गोल्ड फाइनेंस कंपनियां और एक्सचेंज से जुड़े स्टॉक्स हैं।
AI की चमक कम होने का इंतजार
मिहिर वोरा का मानना है कि बाजार अक्सर असल नतीजों से पहले ही दिशा तय कर लेता है। AI शेयरों में ऊंचे वैल्यूएशन को बनाए रखने के लिए लगातार पॉजिटिव सरप्राइज जरूरी हैं।
अगर AI की चमक थोड़ी कम होती है और भारत अपनी स्थिर ग्रोथ स्टोरी के साथ आगे बढ़ता है, तो आने वाले समय में बाजार को अपनी सही जगह मिल सकती है। फिलहाल, FII का सतर्क और नेट शॉर्ट रुख इसी अनिश्चितता को दिखाता है।
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