
Budget 2026 Expectations for Shipping Sector: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) रिकॉर्ड लगातार नवें बार 1 फरवरी को बजट पेश करने वाली हैं। अगले वित्त वर्ष 2027 के इस बजट से शिपिंग सेक्टर को काफी उम्मीदें लगी हुई है क्योंकि यह ऐसे समय में आने वाला है, जब टैरिफ वार, जियोपॉलिटिल टेंशन और सप्लाई-चेन की दिक्कतों से दुनिया भर में सामानों की आवाजाही पर असर पड़ रहा है। भारत में कुल बिजनेस का वॉल्यूम के हिसाब से करीब 95% हिस्सा समुद्री रास्ते से होता है, जिसके चलते यह सेक्टर अब सिर्फ लॉजिस्टिक्स का साधन नहीं बल्कि रणनीतिक इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में भी देखा जाने लगा है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बार बजट में नीतियों को जारी रखने और इन पर प्रभावी तरीके से काम करने पर फोकस रह सकता है क्योंकि सरकार समुद्री क्षमता बढ़ाने, लॉजिस्टिक्स लागत घटाने और एक्सपोर्ट को लेकर कॉम्पटीशन बढ़ाने पर जोर दे रही है। प्रभुदास लीलाधर में इक्विटी रिसर्च के वाइस प्रेसिडेंट अमित अनवानी का कहना है कि अनुकूल बेस इफेक्ट के चलते इस साल शिपिंग सेक्टर को बेहतर आवंटन की उम्मीद है, जिसमें शिपिंग, पोर्ट्स और इनसे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर जारी रहेगा। इसके चलते मझगांव डॉक, SCI, कॉनकोर और अदाणी पोर्ट्स जैसे स्टॉक्स पर खास नजर रहेगी।
Budget 2026 Expectations for Shipping Sector: क्या हैं उम्मीदें?
पिछले साल के बजट में सागरमाला प्रोग्राम के तहत फंडिंग जारी रखी गई। साथ ही पोर्ट को मॉडर्न बनाने और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी; पोर्ट गवर्नेंस को मॉडर्न बनाने के लिए इंडियन पोर्ट्स बिल, 2025; और शिपबिल्डिंग, शिप की रिपेयरिंग और ग्रीन शिपिंग से जुड़े ऐलान हुए थे। अब इस बार बजट से उम्मीद की है कि पोर्ट और शिपबिल्डिंग के बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए लंबे समय के लिए स्थिर और सस्ती दरों पर फंडिंग को लेकर ऐलान हो सकता है। साथ ही शिपिंग इंडस्ट्री को फटाफट कस्टम्स क्लियरेंस, पोर्ट लॉजिस्टिक्स एफिसिएंसी में सुधार और बेहतर लास्ट-माइल कनेक्टिविटी की उम्मीदें हैं। साथ ही इंडस्ट्री का मानना है कि बजट में देश में शिपबिल्डिंग, रिपेयर फैसिलिटीज और वेसल्स बनाने को प्रोत्साहित करने के लिए बड़े ऐलान हो सकते हैं जिससे विदेशों पर निर्भरता कम होगी।
शिपिंग इंडस्ट्री की क्या हैं दिक्कतें?
कैपेसिटी बढ़ाए जाने के बावजूद भारत में लॉजिस्टिक्स कॉस्ट अधिक बनी हुई है जिससे एक्सपोर्ट सेक्टर में इसकी कॉम्पटीशन कैपेबिलिटी पर असर पड़ता है। साथ ही इसकी दिक्कत ये भी है कि भारतीय झंडे वाले वेसल्स अभी भी भारतीय कारोबार का कुछ ही हिस्सा ढोते हैं, जिससे विदेशी शिपिंग पर अधिक निर्भर होना पड़ता है है। साथ ही पोर्ट्स और शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट्स के लिए सस्ती दरों पर लॉन्ग टर्म फंडिंग की जरूरत पड़ती है जो प्राइवेट इंवेस्टमेंट के लिए अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
अभी तक की ग्रोथ को लेकर बात करें तो भारत में पोर्ट हैंडलिंग कैपेसिटी बढ़कर सालाना 260 करोड़ टन से अधिक हो चुकी है। साथ ही मशीनीकरण और डिजटलीकरण के चलते अहम पोर्ट्स पर टर्नअराउंड टाइम में तेजी से सुधार हुआ है। सरकार ने जहाज बनाने के काम को बढ़ावा देने के लिए ₹69,725 करोड़ के पैकेज को मंजूरी दी है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक इस मामले में टॉप-10 में आना है। इसके अलावा सागरमाला और नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी के तहत पोर्ट्स से जुड़ी सड़कों, रेल और लॉजिस्टिक्स पार्क्स पर जोर दिया है ताकि एंड-टू-एंड एफिसिएंसी में सुधार हो।
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