
डॉलर के मुकाबले रुपया 23 जनवरी को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। कंपनियों और आयातकों की तरफ से डॉलर की स्ट्रॉन्ग डिमांड का असर रुपये पर पड़ा। इससे यह गिरकर 91.93 के लेवल पर आ गया। 21 जनवरी को भी रुपये में बड़ी गिरावट दिखी थी। यह 0.2 फीसदी गिरकर 91.74 के लेवल पर आ गया था। 23 जनवरी को डॉलर के मुकाबले 91.43 के लेवल पर खुला। लेकिन, डॉलर की ज्यादा मांग से यह दबाव में आ गया।
इन दो वजहों से डॉलर के मुकाबले फिसला रुपया
मार्केट पार्टिसिपेंट्स का कहना है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली की वजह से रुपये पर दबाव बना हुआ है। फॉरेक्स डीलर्स का कहना है कि जब तक जियोपॉलिटिकल रिस्क में कमी नहीं आती है और अमेरिका के साथ ट्रेड डील का ऐलान नहीं होता है रुपये पर दबाव बना रह सकता है। फिलहाल विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और आयातकों की डॉलर की खरीदारी रुपये में गिरावट की बड़ी वजहें हैं।
आरबीआई के हस्तक्षेप करने पर आ सकती है कुछ रिकवरी
सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित पाबरी ने कहा कि ग्लोबल रिस्क का करीब पूरा असर रुपये पर पड़ चुका है। इसके बाद घरेलू करेंसी में कंसॉलिडेशन दिख सकता है। अगर रिस्क सेंटिमेंट स्टैबलाइज हो जाता है तो इसमें कुछ रिकवरी दिख सकती है। 92.00 का लेवल रुपये के लिए स्ट्रॉन्ग रेसिस्टेंस लेवल है। अगर आरबीआई रुपये को मजबूती देने के लिए कदम उठाता है तो यह फिर से 90.50-90.70 की रेंज में आ सकता है।
अमेरिकी बॉन्ड्स में आरबीआई की होल्डिंग 5 साल के निचले स्तर पर
बैंकर्स का कहना है कि इंपोर्ट्स ने प्राइवेट बैंकों से डॉलर की खरीदारी की, जिससे रुपये पर अचानक दबाव बढ़ गया। बताया जाता है कि अभी आरबीआई ने रुपये को सहारा देने के लिए फॉरेक्स मार्केट में हस्तक्षेप नहीं किया है। रुपये को मजबूती देने की कोशिश की वजह से अमेरिकी सरकार के बॉन्ड्स में आरबीआई की होल्डिंग गिरकर पांच साल के निचले स्तर पर आ गई है।
रुपये में कमजोरी से आयातकों को होगा नुकसान
डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आयातकों के लिए बुरी खबर है। विदेश यात्रा करने वाले लोगों और विदेश में पढ़ाई और इलाज कराने वाले लोगों पर भी रुपये की कमजोरी का खराब असर पड़ता है। उधर, निर्यातकों के लिए यह अच्छी खबर हैं। रुपये में कमजोरी का उनके रेवेन्यू पर पॉजिटिव असर पड़ता है।