Budget 2026: बजट से पहले क्यों सुस्त पड़ जाता है शेयर बाजार? पिछले 15 सालों का देख लीजिए ये डेटा – budget 2026 why does the stock market lose momentum ahead of the budget a look at 15 year data


Budget 2026: केंद्र सरकार आगामी 1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश करने जा रही है। बीते सालों के आंकड़ों को देखें तो यह साफ संकेत मिलता है कि शेयर बाजार बजट के आसपास अक्सर संघर्ष करता नजर आया है। हालांकि, लंबी अवधि में तीन और छह महीने के नजरिए से इक्विटी मार्केट्स ने निवेशकों को कहीं बेहतर रिटर्न दिए हैं। पीएम नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक कुल 14 केंद्रीय बजट (अंतरिम बजट सहित) पेश किए जा चुके हैं। इस दौरान सेंसेक्स और निफ्टी ने बजट से ठीक पहले और ठीक बाद के एक महीने में तुलनात्मक रुप से कमजोर प्रदर्शन किया है।

आंकड़ों के अनुसार, बजट से पहले के एक महीने में शेयर बाजार ने 10 बार नेगेटिव रिटर्न दिए हैं। वहीं बजट के बाद के एक महीने में 7 बार बाजार लाल निशान में रहा। औसतन, बजट से पहले के एक महीने में शेयर बाजार करीब 0.4% और बजट के बाद एक महीने में लगभग 0.5% फिसला है।

हालांकि इसके उलट लंबी अवधि में तस्वीर काफी बेहतर नजर आती है। साल 2014 के बाद से बजट से पहले के तीन महीनों में 10 बार और छह महीनों में 11 बार बाजार ने पॉजिटिव रिटर्न दिए हैं। इसी तरह, बजट के बाद के तीन महीनों में 9 बार और छह महीनों में 11 बार बाजार हरे निशान में रहा। औसतन देखें तो बजट से पहले के तीन महीने की अवधि का रिटर्न करीब 3.1% और बाद के तीन महीनों का रिटर्न 1.2% रहा है। वहीं छह महीने की अवधि में यह आंकड़ा बजट से पहले लगभग 8% और बाद में करीब 6% रहा है।

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वेल्थमिल्स सिक्योरिटीज के इक्विटी स्ट्रैटेजी डायरेक्टर, क्रांति बथिनी का कहना है कि केंद्रीय बजट अब भी शेयर बाजार के लिए एक बड़ा इवेंट बना हुआ है। लेकिन पिछले कुछ सालों में इसकी भूमिका बदलती गई है। उन्होंने कहा कि GST लागू होने और इनडायरेक्ट टैक्स से जुड़े अधिकतर फैसले अब GST काउंसिल के दायरे में आ गए हैं। इसके चलते बजट का फोकस धीरे-धीरे सीमित होकर डायरेक्ट टैक्स, जैसे इनकम टैक्स और चुनिंदा नीतिगत घोषणाओं तक सिमट गया है।

हालांकि, बाथिनी के मुताबिक बजट की अहमियत अब भी बनी हुई है, खासकर राजकोषीय घाटे, सरकार की उधारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे पर खर्च, रेलवे और कैपिटल एक्सपेंडिचर लक्ष्यों को लेकर। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अब शेयर बाजार केवल बजट पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि ग्लोबल भू-राजनीतिक घटनाओं, मार्केट साइकल और विदेशी व घरेलू संस्थागत निवेशकों की चाल जैसे कई कारण बाजार की दिशा तय करते हैं। हाल के सालों में बजट भले ही महत्वपूर्ण रहा हो, लेकिन वह हमेशा बाजार का चलाने वालाइकलौता ड्राइवर नहीं रहा है।

मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि बजट वाले दिन बाजार की प्रतिक्रिया अक्सर अचानक होती है। निवेशक प्रस्तावों और उनके संभावित असर को समझने की कोशिश में रहते हैं, जिसके चलते उसी दिन बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। वहीं, बजट से पहले के एक महीने में बाजार की चाल आमतौर पर ग्लोबल संकेतों, एफआईआई और डीआईआई के फंड फ्लो और कंपनियों से जुड़ी खबरों पर ज्यादा निर्भर रहती है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बजट को लेकर उम्मीदें आमतौर पर बजट से करीब एक हफ्ते पहले बननी शुरू होती हैं। मीडिया चर्चाएं, इंडस्ट्री संगठनों की मांगें और नीति निर्माताओं के संकेत इन उम्मीदों को हवा देते हैं। अगर कोई नई सरकार अपना पहला बजट पेश कर रही हो, तो ये उम्मीदें और ज्यादा तेज हो जाती हैं।

मार्केट एनालिस्ट दीपक जसानी का मानना है कि बजट के बाद वाले महीने में शेयर बाजार की चाल कई बार बजट से पहले वाले महीने के उलट होती है, बशर्ते बजट उम्मीद से बहुत बेहतर या बहुत खराब न हो। उनके अनुसार, निवेशकों की असली प्रतिक्रिया बजट के बाद वाले हफ्ते में केंद्रित रहती है, जब वे घोषणाओं के साथ-साथ वित्त मंत्री की ओर से आने वाले स्पष्टीकरण और बयानों की एनालिसिस करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि छह और बारह महीने जैसी लंबी अवधि में बाजार का प्रदर्शन बजट की उम्मीदों से काफी हद तक स्वतंत्र रहता है और ग्लोबल रुझानों, लिक्विडिटी और आर्थिक कारणों से प्रभावित होता है।

इतिहास बताता है कि बजट से पहले और बाद की रैलियां अक्सर देखने को मिलती हैं, लेकिन ये रैलियां आमतौर पर तेज और अल्पकालिक होती हैं। बजट से पहले उम्मीदों के दम पर बाजार चढ़ता है और घोषणाओं के बाद मुनाफावसूली देखने को मिलती है, जिसका असर एक महीने के कमजोर औसत रिटर्न में दिखाई देता है। विश्लेषकों के मुताबिक, बाजार आमतौर पर सुधारों वाले बजट की उम्मीद करता है, लेकिन हाल के कई बजट इन ऊंची अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए हैं।

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