न गोल्ड, न डॉलर… असली पैसा निफ्टी ने बनाया! आ गए पिछले 27 साल के आंकड़े – gold vs nifty vs s and p 500 index nifty emerges as the biggest wealth creator over 27 years



Gold vs Nifty vs S&P 500: सोना-चांदी, यहां तक कि अमेरिकी शेयर बाजार ने भी इस साल शानदार प्रदर्शन किया है। ऐसे में यह सवाल उठने लग गए हैं कि क्या सच में सोना, शेयर बाजार से बेहतर निवेश बन गया है? क्या डॉलर के मुकाबले भारतीय शेयर बाजार कमजोर साबित हुआ है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या लॉन्ग-टर्म में सेंसेक्स और निफ्टी से ज्यादा पैसा गोल्ड में बन सकता हैं? आइए इसे विस्तार से समझते हैं-

दरअसल, साल 2025 में सोने ने ऐसा प्रदर्शन किया है कि शेयर मार्केट के निवेशक भी हैरान रह गए हैं। सोने की कीमतें भारत और विदेश दोनों जगह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड 4,500 डॉलर प्रति औंस के करीब है और भारत में MCX पर सोन के भाव 1.40 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास ट्रेड कर रहा है। सिर्फ इसी साल सोने में करीब 80 फीसदी की जबरदस्त तेजी देखने को मिली है, जबकि निफ्टी 50 का रिटर्न महज 10 फीसदी के आसपास ही रहा। जाहिर सी बात है कि सोने के मुकाबले यह रिटर्न काफी कम है।

यही वजह है कि अब सोशल मीडिया से लेकर निवेशकों तक एक ही चर्चा है कि “क्या शेयर बाजार छोड़कर अब गोल्ड में SIP शुरू कर देनी चाहिए?” इस बहस को और हवा तब मिली जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट सामने आई। इस पोस्ट में कहा गया कि अगर डॉलर के हिसाब से देखा जाए तो गोल्ड ने भारतीय शेयर बाजार को लंबे समय में पीछे छोड़ दिया है।

पोस्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी डॉलर के हिसाब से 1994 में निफ्टी डॉलर के हिसाब से करीब 1,000 के स्तर पर था, जो अब बढ़कर करीब 10,500 तक पहुंचा है। इसका मतलब यह हुआ कि निफ्टी का CAGR इस दौरान करीब 7.8 फीसदी रहा। वहीं इसी अवधि में सोने का भाव 345 डॉलर से बढ़कर 4,550 डॉलर तक पहुंच गया, यानी गोल्ड का CAGR करीब 8.6 फीसदी रहा। इस तुलना के बाद निष्कर्ष यही निकाला गया कि गोल्ड ने लॉन्ग-टर्म रिटर्न देने के मामले में इक्विटी को मात दे दी।

लेकिन यहीं पर एंट्री होती है भारत के जाने-माने निवेशक और फंड मैनेजर Samir Arora की, जिन्होंने इस पूरे नैरेटिव को पलट कर रख दिया। Samir Arora ने साफ कहा कि निवेश की तुलना करते वक्त सबसे बड़ी गलती लोग टाइम पीरियड और बेंचमार्क चुनने में करते हैं। अगर आप शुरुआत और अंत अपने हिसाब से चुनेंगे, तो नतीजे भी अपने मनपसंद निकाल सकते हैं। उन्होंने अपने जवाब में एक अलग टाइम फ्रेम और ज्यादा सटीक डेटा के साथ तस्वीर सामने रखी।

Samir Arora के मुताबिक अगर 31 दिसंबर 1998 से लेकर आज तक का डेटा देखा जाए और निफ्टी 50 को डॉलर टर्म्स में मापा जाए, तो नतीजे बिल्कुल अलग निकलते हैं। इस अवधि में निफ्टी 50 का टोटल रिटर्न करीब 1,922 फीसदी रहा है, जो सालाना करीब 11.78 फीसदी CAGR बैठता है। वहीं इसी अवधि में गोल्ड का कुल रिटर्न करीब 1,472 फीसदी रहा, यानी सालाना लगभग 10.74 फीसदी। मतलब यह कि सही समय सीमा में देखें तो निफ्टी ने गोल्ड से बेहतर प्रदर्शन किया है, वो भी डॉलर में।

इतना ही नहीं, समीर अरोड़ा ने अमेरिका के शेयर बाजार से भी तुलना की। उन्होंने बताया कि इसी अवधि में अमेरिका का प्रमुख इंडेक्स S&P 500 सिर्फ करीब 821 फीसदी का रिटर्न दे पाया, जो सालाना लगभग 8.57 फीसदी बैठता है। यानी इस तुलना में न तो S&P 500 निफ्टी से बेहतर रहा और न ही गोल्ड से।

लेकिन समीर अरोड़ा ने यहां एक और अहम बात कही। उन्होंने कहा कि अगर आप S&P 500 से तुलना कर रहे हैं, तो निफ्टी 50 सही बेंचमार्क नहीं है। उसके लिए सही तुलना NSE 500 से होनी चाहिए, क्योंकि वह भारतीय बाजार की ज्यादा व्यापक तस्वीर दिखाता है।

और जब NSE 500 के आंकड़े सामने आए, तो तस्वीर और साफ हो गई। समीर अरोड़ा के मुताबिक NSE 500 ने इसी अवधि में करीब 2,590 फीसदी का रिटर्न दिया है, जो सालाना लगभग 12.96 फीसदी CAGR के बराबर है, वो भी डॉलर टर्म्स में। यानी रुपये की गिरावट के बावजूद भारतीय इक्विटी ने न सिर्फ गोल्ड को पछाड़ा, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े शेयर बाजार अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया।

यहां सबसे अहम बात यह है कि ये सारे रिटर्न रुपये की कमजोरी को ध्यान में रखते हुए डॉलर में गिने गए हैं। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि रुपये की गिरावट विदेशी निवेशकों के लिए नुकसानदायक है, लेकिन इन आंकड़ों से साफ है कि मजबूत इक्विटी रिटर्न उस असर को भी कवर कर लेते हैं।

हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सोना खराब निवेश है। सोना हमेशा से एक सेफ हेवन एसेट रहा है, जो संकट के समय पोर्टफोलियो को सुरक्षा देता है। लेकिन अगर बात लंबे समय में असली वेल्थ क्रिएशन की हो, तो इतिहास यही बताता है कि इक्विटी, खासकर भारत जैसे ग्रोथ इकोनॉमी में, सबसे आगे रहती है।

समीर अरोड़ा का संदेश बिल्कुल साफ है कि सोना चमक जरूर सकता है और कुछ सालों में जबरदस्त रिटर्न भी दे सकता है, लेकिन लंबी रेस में दौड़ जीतने वाला एसेट अब भी इक्विटी ही है। खासतौर पर अगर निवेश अनुशासित तरीके से इंडेक्स में और लंबे समय के लिए किया जाए।तो अगर आप 20–25 साल का नजरिया रखते हैं, तो गोल्ड को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी सही नहीं है, लेकिन सिर्फ गोल्ड पर निर्भर रहना भी समझदारी नहीं होगी। असली संतुलन वहीं है जहां इक्विटी ग्रोथ देती है और गोल्ड सुरक्षा।

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